फेहरिस्त

सालों से गुज़र रहे हैं साल
हर साल के आखिर में होता है एक धमाल
धमालों में मच जाते हैं अक्सर बवाल
और अनसुलझे रह जाते हैं
दिसंबर में जनवरी के सवाल

हर साल का आगाज़ बनाती है
एक नई उम्मीदों की फ़ेहरिस्त
बनाना है बेहतर हर किसी को अपनी जीस्त
हम तो इन तमन्नाओं की होड़ में
रह जाते हैं वहीं के वहीं
उम्मीदें बस उम्मीदें ही रह जाती हैं
फिर दिसंबर आता हैं
फिर से जुट जाते हैं
बनाने में एक लंबी लिस्ट

इस बार इस लिए चलो
फेहरिस्तों को जलाते हैं
बस खुश रहने का ठानते हैं
मुस्कुराते हैं
मुस्कुराहटों की वजह बनते हैं
नफरतों को ठुकराते हैं
मोहब्बतों को आजमाते हैं
चलो जश्न ए ज़िन्दगी मनाते हैं
बोझ उम्मीदों का उतारकर
नए साल का स्वागत करते है

(Uttam’s pen)

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HAPPY NEW YEAR